कालनेमि: एक दैत्य: जिसने सतयुग से कलियुग तक भगवान विष्णु का पीछा नहीं छोड़ा

भारतीय पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में कई ऐसे असुरों का वर्णन मिलता है जिन्होंने देवताओं और भगवान के अवतारों को चुनौती दी। इन्हीं में एक अत्यंत शक्तिशाली और जिद्दी असुर था कालनेमि, जिसकी कथा सतयुग से लेकर द्वापर और कलियुग तक फैली हुई बताई जाती है। मान्यता है कि कालनेमि ने बार-बार जन्म लेकर भगवान विष्णु से प्रतिशोध लेने का प्रयास किया, लेकिन हर बार उसे पराजय का सामना करना पड़ा।
सतयुग से शुरू हुई कालनेमि की कहानी
सतयुग में दो अत्यंत शक्तिशाली दैत्य हुए— हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। इन दोनों भाइयों का आतंक इतना बढ़ गया था कि देवताओं और ऋषियों की रक्षा के लिए स्वयं भगवान विष्णु को अवतार लेना पड़ा।
हिरण्याक्ष ने अपनी शक्ति से पृथ्वी को समुद्र में डुबो दिया था, जिसके बाद भगवान विष्णु ने वाराह अवतार लेकर उसका वध किया और पृथ्वी को बचाया। हिरण्याक्ष के दो पुत्र थे— अंधक और कालनेमि, जो अपने पिता की तरह ही अत्यंत बलशाली और अहंकारी थे।
प्रतिशोध की अग्नि और कालनेमि का संकल्प
जब तक हिरण्यकशिपु जीवित रहे, तब तक दोनों भाइयों को उनका संरक्षण मिला। लेकिन जब भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का वध किया, तब अंधक और कालनेमि ने देवताओं से बदला लेने की ठान ली। अंधक ने अपने अहंकार में आकर देवी पार्वती के प्रति धृष्टता कर दी, जिसके कारण भगवान शिव ने उसका वध कर दिया। इसके बाद कालनेमि ने प्रतिशोध की भावना से अपनी पुत्री वृंदा (तुलसी) का विवाह जालंधर नामक दैत्य से कर दिया, जो भगवान शिव का घोर शत्रु था।
हालाँकि अंततः भगवान विष्णु की लीला और भगवान शिव के पराक्रम से जालंधर का भी अंत हो गया। इससे क्रोधित होकर कालनेमि ने भगवान विष्णु से बदला लेने की प्रतिज्ञा कर ली।









