कोरोना से कतारों तक: क्या बदला है?: सिस्टम के बीच पिसता आम आदमी
तस्वीरें कभी झूठ नहीं बोलतीं। वो सच्चाई दिखाती हैं, जिसे अक्सर शब्द भी बयान नहीं कर पाते। एक समय था जब कोरोना महामारी के दौरान लाखों लोग सड़कों पर थे—घर पहुंचने की जद्दोजहद में, भूखे-प्यासे, बेबस।
आज वक्त बदल गया है, लेकिन तस्वीरें नहीं बदलीं…
अब भी लोग कतारों में हैं—बस वजहें बदल गई हैं।
कोरोना काल: जब घर पहुंचना ही सबसे बड़ी जंग थी
कोरोना के दौर में देश ने वो मंजर देखा, जो शायद इतिहास में कभी नहीं देखा गया था। लाखों मजदूर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलते नजर आए, बसों, ट्रेनों और सड़कों पर सिर्फ भीड़ और बेबसी थी, हर चेहरे पर डर, थकान और अनिश्चितता, उस समय लाइनें जीवन बचाने के लिए थीं… आज वही लाइनें जीवन चलाने के लिए हैं।
आज की हकीकत: पेट्रोल, राशन और गैस के लिए कतारें
आज फिर वही भीड़ है, वही लंबी कतारें— पेट्रोल पंपों पर घंटों इंतजार, राशन की दुकानों पर भीड़, LPG गैस के लिए परेशान लोग, ये सिर्फ भीड़ नहीं है, ये उस सिस्टम की तस्वीर है, जहां बुनियादी जरूरतें भी संघर्ष बन जाती हैं।







