नागा साधु बनाम अहमद शाह अब्दाली: जब गोकुल में नागा साधुओं ने रोकी अहमद शाह अब्दाली की सेना

सन 1757 में भारत पर चौथे आक्रमण के दौरान अफ़गान शासक अहमद शाह अब्दाली (अहमद शाह दुर्रानी) ने दिल्ली, मथुरा और वृंदावन में भारी तबाही मचाई। इतिहास के पन्नों में दर्ज यह कालखंड अत्यंत रक्तरंजित और त्रासद माना जाता है। किंवदंतियों और लोककथाओं में वर्णित एक महत्वपूर्ण प्रसंग गोकुल का है, जहाँ कथित रूप से नागा साधुओं ने अब्दाली की सेना का मुकाबला किया।
यह लेख उसी ऐतिहासिक प्रसंग, उपलब्ध स्रोतों और जनश्रुतियों के आधार पर विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करता है।
अब्दाली का चौथा आक्रमण और मथुरा-वृंदावन की त्रासदी
अहमद शाह अब्दाली ने 1748 से 1767 के बीच कई बार भारत पर आक्रमण किया। 1757 के हमले में दिल्ली पर कब्ज़ा करने के बाद उसने अपने सेनापतियों को मथुरा, वृंदावन और आगरा की ओर बढ़ने का आदेश दिया।
ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार, इस दौरान मथुरा और वृंदावन में व्यापक लूटपाट, हत्या और धार्मिक स्थलों को क्षति पहुँचाई गई। यह घटना भारतीय इतिहास के उन अध्यायों में से एक है, जिसे आज भी दर्द के साथ याद किया जाता है।
गोकुल में नागा साधुओं का मोर्चा
गोकुल की सीमा पर लगभग 4,000 से 5,000 नागा साधुओं के एकत्र होने का उल्लेख लोककथाओं और कुछ ऐतिहासिक संदर्भों में मिलता है।
नागा साधु, जिन्हें कई परंपराओं में “शिव के वीर योद्धा” कहा जाता है, मुख्यतः अखाड़ा परंपरा से जुड़े होते हैं। वे आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ युद्धकला में भी प्रशिक्षित माने जाते थे। कहा जाता है कि जब अब्दाली की सेना गोकुल की ओर बढ़ी, तब इन नागा साधुओं ने त्रिशूल, तलवार और पारंपरिक हथियारों के साथ मोर्चा संभाला।









