कैसे बदले इतिहास के पन्ने: औरंगजेब को 27 साल तक दौड़ाते रहे संताजी-धनाजी

17वीं सदी के अंत में दक्षिण भारत की धरती पर ऐसा संघर्ष छिड़ा जिसने मुगल साम्राज्य की नींव हिला दी।
छत्रपति संभाजी महाराज की क्रूर हत्या के बाद मुगल बादशाह औरंगजेब को लगा कि मराठा शक्ति बिखर जाएगी। लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा—मराठा सरदारों ने एकजुट होकर ऐसा प्रतिशोध लिया कि मुगल सेना के मनोबल की कमर टूट गई।
संभाजी महाराज की क्रूर हत्या और मराठों का ज्वालामुखी आक्रोश
1689 में संगमेश्वर के पास मुगल सेना ने छलपूर्वक संभाजी महाराज को बंदी बना लिया। इतिहासकारों के अनुसार उन्हें 40 दिनों तक अमानवीय यातनाएं दी गईं और इस्लाम स्वीकार करने का दबाव डाला गया, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। 11 मार्च 1689 को तुलापुर में उनकी निर्मम हत्या कर दी गई।
इस घटना ने मराठा समाज में प्रतिशोध की ज्वाला प्रज्वलित कर दी। सभी मतभेद भुलाकर मराठा सरदारों ने एक ही लक्ष्य निर्धारित किया—मुगल सत्ता का अंत।
रायगढ़ पर कब्जा और राजाराम का राज्याभिषेक
संभाजी महाराज की शहादत के बाद मुगल सेनापति जुल्फिकार खान ने रायगढ़ किले पर कब्जा कर लिया और महारानी येसुबाई तथा उनके पुत्र शाहू को बंदी बना लिया।
ऐसे संकट में संभाजी के छोटे भाई राजाराम महाराज को छत्रपति घोषित किया गया। बाद में उन्हें सुरक्षित रूप से जिंजी (तमिलनाडु) भेजा गया, जहां से मराठा संघर्ष जारी रहा।









