ताजमहल पर वक्फ़ दावा: सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और 2005 का विवाद फिर चर्चा में

भारत की विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक धरोहर ताजमहल एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक बहस के केंद्र में है। ताजमहल पर मालिकाना हक को लेकर उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ़ बोर्ड और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के बीच लंबे समय से विवाद चलता रहा है।
यह विवाद 2005 में तब चर्चा में आया था, जब वक्फ़ बोर्ड ने आदेश जारी कर ताजमहल को अपनी संपत्ति के रूप में दर्ज करने की कोशिश की थी। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस दावे पर रोक लग गई।
2005 में ताजमहल को वक्फ़ संपत्ति घोषित करने का आदेश
13 जुलाई 2005 को उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने एक आदेश पारित कर ताजमहल को वक्फ़ संपत्ति के रूप में रजिस्टर करने का निर्देश दिया था।
उस समय वक्फ़ बोर्ड के चेयरमैन हफीज़ उस्मान थे, जो समाजवादी पार्टी के विधायक भी थे।
बताया जाता है कि बोर्ड के सीईओ को निर्देश जारी कर ताजमहल को वक्फ़ संपत्ति रजिस्टर में दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।
उस समय उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। मुख्यमंत्री ने कहा था कि राज्य सरकार वक्फ़ बोर्ड के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी और जिसे आपत्ति है वह अदालत जा सकता है।
एएसआई ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती
ताजमहल भारत के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्मारकों में से एक है और इसकी देखभाल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) करता है।
वक्फ़ बोर्ड के आदेश के बाद एएसआई ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने वक्फ़ बोर्ड से पूछा कि:
क्या उनके पास कोई वक्फ़नामा है?
क्या मुगल सम्राट शाहजहां ने ताजमहल को वक्फ़ संपत्ति घोषित किया था?
क्या इसके समर्थन में कोई दस्तावेज़ या हस्ताक्षर मौजूद हैं?






